चौपाल नीता की ...

Sunday, 19 July 2020

चाय महंगी हो गयी है ...

चाय का रिश्ता 
बहता है धमनियों में 
लहू के साथ, जो 
दिल से होकर गुजरता है,और 
अदरक की तीखापन 
इलायची की ख़ुश्बू से 
रिश्तों को संवार जाता है।

चाय अगर जोड़ती है तो ...
वही चाय उबल-उबल कर 
अपनी कड़वाहट 
दिलों में घोल भी देती है जिसे _
लेकर शिराएँ नीली काली रंगी
ऑक्सिजन की सप्लाई हैं खोजती।

शिराओं में दौड़ता 
बदगुमानी का लहू 
पनाह लेता है दिल में जाकर,
दिल उसे जोड़कर 
बहा देता है भावनाओं के 
ज्वार-भाटे में ...
चाय की भांप में रवां होता 
ज्वार-भाटे का उफ़ान, जो 
रिश्तों को पलाश की गोंद से जोड़ देता है।

चाय को सोचना 
यादों के गलिहारे में गुम हो जाना है 
नशा होती है चाय 
जो यादों को हर चुस्की के साथ 
सामने ला खड़ा करती है।

चाय और दोस्ती का 
बड़ा गहरा नाता है,
चाय की महफ़िलें 
दोस्तों से ही गुलज़ार होती है,
बेफ़िक्र कहकहे !!
क़िस्सागोई की सरगोशियाँ !!
चाय की भाँप में छुपा 
इश्क़ !!
क्या नहीं जुड़ा है 
इस चाय के संग ....।

कटिंग चाय इक दूजे संग साझा करना,
चाय का प्याली से फिसलकर रकाबी में आ जाना,
चुस्कियों का घूँट में बंट जाना, 
दोस्तों की मसरूफियत का अफ़साना बन जाती है।

यारियों के किस्से चाय की चुस्कियों संग 
गुमशुदा हो गए ...
अपनों की शक्लें अब बेजारियों से ओझल हो गयी हैं 
दोस्त अब कॉफ़ी के तलबगार हो गए ...।

उबलते कढ़ते चाय नीम कड़वा काढ़ा बन जाती है,
आँखें इंतज़ार की आरामगाह बन जाती हैं,
दोस्तों का वक्त कीमती हो जाता है ...
दोस्ती अनजान राहों पर भटक जाती है।

अब तो आवाज़ भी पुकार-पुकार कर थक गई है 
दोस्तों की दोस्ती वाली चाय महँगी हो गयी है,
चाय अभी भी दस रुपये तक ही पहुँच पाई है, जबकि 
कॉफी उसे पछाड़ कर बहुत आगे निकल गयी है।

चाय और दोस्त !
चाय और दोस्ती !!
अब बहुत महंगी हो गयी है।


Saturday, 18 July 2020

वक्त से डरो

“ वक्त से डरो ” कहा था किसी ने 
“ कैसे डरूँ ” सोचती रह गयी थी मैं !

अब समझ में आया है कि 
वक्त से डरना क्या होता है ...।

यह कोरोना काल बहुत कुछ ले जा रहा है 
रिश्तों का रेला 
यारी दोस्ती 
दुनिया और समाज !!

सिखला भी बहुत कुछ जा रहा है 
अकेले आये हो , 
अकेले जाना है 
फिर क्यों भला 
इस वक्त से 
इतना घबराना ...

जिन खिड़कियों से 
धूप सोना चांदी बिखेरती थी
अब उन पर लगा पहरा है
पर्दों की झिर्री से 
अब साये ही नज़र आते हैं ...

दरवाजे अब नहीं खुलते 
भीतर से बाहर 
बाहर से भीतर 
कदम नहीं चलते ...

सुनने को किवाड़ पर एक ठकठक 
जा खड़ी होती हूँ किवाड़ के पीछे 
कोई पदचाप नहीं सुनाई देती 
आती ही नहीं तो भला लौटेगी कैसे ...

पड़ोस से आती सिसकियों की आवाज़ 
एम्बुलेंस के पहियों की चीख
मंगल ग्रह से आये जीवों से 
स्वास्थ्यकर्मियों के बूट की आवाज़ 
दहशत फैलती है ...

घबराहट है कि थमती नहीं,
ज़िन्दगी है कि चलती नहीं,
सांस है कि थमती नहीं ...
तिल-तिल कर रोज मरने से 
एक बार का “ अलविदा ” कहना बेहतर है।

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