चौपाल नीता की ...

Tuesday, 17 August 2021

अफगानिस्तान या तालिबान : एक नज़रिया

 इराक के बाद अफगानिस्तान में सुपरपॉवर अमेरिका के लिए साबित हो गया कि अमेरिका विद्रोह से नहीं जीत पाता है। 

बाइडेन के कार्यकाल का ब्लंडर उनके राजनीतिक करियर पर सबसे बड़ा धब्बा बन गया।

अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति को एक ताकतवर लोकतंत्र की कट्टर धार्मिक संगठन के हाथों हार के रूप में देखा जाएगा।

जिस अफगान सेना को हजारों करोड़ों डॉलर के हथियारों और ट्रेनिंग से खड़ा करने का दावा किया गया था, वो तालिबान के सामने धराशायी हो गई। टक्कर देना तो दूर की बात है, कई जगहों पर तो सेना लड़ी तक नहीं।

नैरेटिव तो ये है कि एक गरीब देश के गुरिल्ला लड़ाकों  ने बिना किसी एयर सपोर्ट व आर्टिलरी के अमेरिकी सुपरपावर को शिकस्त दे दी।

अफगानिस्तान में 20 साल बिताने के बाद जब अमेरिका ने वापसी की तो साथ-साथ तालिबान का कब्जा हो गया।

सुपरपॉवर अमेरिका ने 20 वर्षों तक अफगानिस्तान में सिवाय बदनामी के कुछ नहीं हासिल किया। अगर अफगानिस्तान फिर से अल-कायदा, ISIS जैसे आतंकी संगठनों का पनाह देने वाला बनता है तो अमेरिका के 2 लाख करोड़ डॉलर जो उसने अफगानिस्तान में टैक्सपेयर्स के उड़ा दिए वे ही उसकी विश्वसनीयता और सम्मान पर सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह बनकर उठ खड़ा होगा।

पूरे शहर में अफरा-तफरी का माहौल बना दिया गया।देश से निकलने के लिए काबुल एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़ लग गयी।

बाइडेन और अमेरिकी सरकार भले ही इसके जिम्मेदार अशरफ गनी, अफगान सेना, ट्रंप और तालिबान के बीच हुई दोहा डील को ठहरायें लेकिन इससे ये हकीकत नहीं बदलेगी कि बाइडेन के कार्यकाल की यह सबसे बड़ी गलती है। इतिहास उनके ब्लंडर को सदैव याद रखेगा।

संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान के प्रतिनिधि, गुलाम एम इसाकजई ने कहा, "आज मैं अफगानिस्तान के लाखों लोगों की ओर से बोल रहा हूँ। मैं उन लाखों अफगान लड़कियों और महिलाओं की बात कर रहा हूँ, जो स्कूल जाने और राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक जीवन में भाग लेने की अपनी आजादी खोने वाली हैं। तालिबान दोहा और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने बयानों में किए गए वादों और प्रतिबद्धताओं का सम्मान नहीं कर रहा है। अफगानिस्तान के लोग डर में जी रहे हैं।"

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव, एंटोनियो गुटेरेस ने अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि , " दुनिया देख रही है और हमें अफगानिस्तान के लोगों को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। मैं सभी पार्टियों को मानवीय मदद देने की अपील करता हूँ। मैं सभी देशों से अपील करता हूँ कि वो शरणार्थियों को स्वीकार करें और डिपोर्टेशन से बचें। मैं तालिबान और सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और सभी व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रता का सम्मान करने और उनकी रक्षा करने की अपील करता हूँ।अफगानिस्तान की महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बढ़ते मानवाधिकारों के उल्लंघन से चिंतित हूँ, जो काले दिनों की वापसी से डर में हैं।”

तालिबान के पॉलिटिकल ऑफिस के प्रवक्ता मोहम्मद नईम ने अल जजीरा से कहा है , “ युद्ध अब खत्म हो चुका है और अफगानिस्तान में अब 'समावेशी इस्लामिक सरकार' बनाई जाएगी। अफगानिस्तान में नई सरकार का 'प्रकार और स्वरुप' क्या होगा, यह जल्दी साफ कर दिया जाएगा। तालिबान पूरी दुनिया से कटा हुआ नहीं रहना चाहता है और हम शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय रिश्ते चाहते हैं। ”

अब तालिबान के 90 के दशक का चेहरा फिर से याद करना होगा।  तालिबान और उनकी मानसिकता को जानने समझने के लिए उसके शासन काल के चरित्र को समझना होगा। 

तालिबान ने 1996 में काबुल पर कब्जा करके दुनिया की सबसे दमनकारी सरकार का शासन चलाया था। 1996 से लेकर 2001 में अमेरिका के हमले तक तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन किया था। 

शरिया कानून को उसने सबसे सख्त रूप में लागू किया था। लोगों की सार्वजानिक तौर पर हत्या, पत्थर मारना और कोड़े मारना आम था। तालिबान की पुलिस सही साइज की दाढ़ी न रखने वाले पुरुषों, टखना दिखाने वाले कपड़े पहनने वाले को मारा-पीटा करती थी। स्त्रियों के लिए वो दौर भयानक था। वो मर्दों की बिना लिखित इजाजत के बाहर नहीं जा सकती थीं और उन्हें बुर्का पहनना पड़ता था। लड़कियों को स्कूली शिक्षा प्राप्त करने तक पर रोक लगा दी गई थी।

तालिबान ने अपने उदारवादी नए स्वरूप को दुनिया के समक्ष लाने के लिए हाल में कई ऐसे बयान जारी किए हैं, जिसमें वो अपनी छवि एक नए और उदार संगठन की पेश करता नज़र आ रहा है। 

● उसने अमेरिकी और नाटो सेनाओं के साथ काम कर चुके या काबुल शासन के अधिकारियों की रक्षा करने का भी आश्वासन दिया है।

● वह किसी की भी निजी संपत्ति को हड़पने के पक्ष में नहीं है। उसने अफगानिस्तान के लोगों और उनकी संपत्तियों की सुरक्षा को अपनी प्रमुख जिम्मेदारी बताया है।

● उसके अनुसार उसके नियंत्रण वाले इलाकों में लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में सामान्य जिंदगी जी सकेंगे।

● राजनयिकों, दूतावासों, कॉन्सुलेट और चैरिटेबल वर्कर्स को आश्वासन दिया गया है कि उनके लिए एक सुरक्षित माहौल बनाया जाएगा।

तालिबान प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने बीबीसी से बातचीत में कहा था, "हम महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करते हैं। हमारी नीति है कि महिलाओं को शिक्षा और काम तक पहुंच दी जाए।”

तालिबान के बयानों पर भरोसा करना बहुत कठिन है क्योंकि हाल की कई घटनाएं उसके कथनी और करनी के फर्क को उजागर करती हैं।

इसे प्रमाणित करते हुए सायरा करीमी जो सरकार द्वारा संचालित फिल्म निर्माण कंपनी की महानिदेशक हैं,  ने अपने ट्वीट में बताया है कि,  “ कुछ हफ्तों में ही तालिबान ने कई स्कूलों को नष्ट कर दिया है और अब 20 लाख लड़कियों को स्कूल से बाहर कर दिया गया है। ”

हमें भारतीय फोटोजर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी की मौत अभी भूली नहीं है। दानिश सिद्दीकी स्पिन बोल्डक क्षेत्र में मार दिये गए थे जिसमें तालिबान ने हत्या में हाथ होने से इनकार किया था किन्तु मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि दानिश की क्रूर हत्या हुई है। जिस पर यथाचरित्र तालिबान ने भी अपना बयान पलटा और नया बयान जारी किया कि, “ दानिश सिद्दीकी बिना इजाजत इलाके में आए थे, इसलिए मारे गए। ”

तालिबान पर भरोसा करने के लिए उनके इतिहास के पन्नों को खोलना और दोहराना होगा। तब कहीं जाकर अपने भरोसे को तराजू पर रखना होगा।

Saturday, 7 August 2021

A Home away from home

 




A Home away from Home 

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पहले मुझे लगता था अपनों द्वारा उपेक्षित और ठुकराये इंसानों के लिए वृद्धाश्रम /Old Age Home आखिरी उपाय हैं ...

किन्तु ....

अब मेरी धारणा बदल रही है ...

अब मुझे लगता है ...

" वृद्धाश्रम इंसान की प्राथमिक ( primary ) आवश्यकता है।

आप ख़ुद बच्चों के साथ सामंजस्य न बैठा पा रहे हों तो ...

बच्चे आपके साथ एडजस्ट न करना चाहते हों तो ...

वृद्धाश्रम को अपनाने में कोई हर्ज़ नहीं।

इसमें कोई शर्मिन्दगी अभिभावकों नहीं होनी चाहिए। 

बच्चों ने आपके साथ रहना नहीं स्वीकार किया तो , अथवा अपनी personal space के लिए उन्होंने अपने घर से आपको निकाल दिया तो , अथवा 

झूठ बोल कर आपको बिना बताये आपके घर को छोड़ कर चले गये तो ....

बजाय दुखी होने के और घोर डिप्रेशन में चले जाने के , और 

अनहोनी को निमंत्रण देने के ...

वृद्धाश्रम को अपनाया ही जाना चाहिए।

NGO , धर्मार्थ कार्य करने वाली संस्थाओं और स्वयं सरकार को वृद्धाश्रम बनवाने और उनका उचित प्रबन्धन किया जाना चाहिए।

आप भी यदि किसी वृद्धाश्रम के बारे में जानते हों तो उसका नाम,पता ,शहर/गाँव एवं उसका शुल्क / Fees के बारे में comment में लिख सकते हैं और उन सभी अनजान ,संकोची व डिप्रेशन से जूझ रहे इंसानों की बिना पूछे मदद कर सकते हैं। हो सकता है आपके द्वारा दी गयी जानकारी को वे चुपचाप ले लें जो उनके बहुत काम आये।

एक हाथ बढ़ा कर देखिये ....

The Legend: Sachin Tendulkar

Over the years, Tendulkar has forged his name in history as the ‘The Greatest Batter of all time’ and he also got nicknamed as The ‘Master B...