चौपाल नीता की ...

Thursday, 20 August 2020


हम किसी के भी द्वारा की गई सहायता को,( भले ही यह उसके कार्य का/उसकी नौकरी का ही हिस्सा क्यों न हो) बड़ी आसानी से उपेक्षित कर देते हैं।

एक छोटा सा आभार प्रदर्शन , भले ही वह ऊपरी मन से किया गया हो, किसी भी सहायक का उत्साह निश्चित रूप से बढ़ा देता है।

हम यहाँ संकीर्ण मानसिकता से काम लेते हैं और सहायकों द्वारा किये कार्य के पीछे के भाव को महसूस करने की जरूरत ही नहीं समझते।

लॉक डाउन का समय अचानक आया था। बीमारी भी एकदम नई थी। इलाज मौजूद नहीं है यह बात भी स्पष्ट थी। बीमार होते ही अस्पताल में अकेले रहना है और सकुशल घर पहुँचेंगें यह भी गारण्टी नहीं थी। मृत्यु होने की दशा में लावारिस की तरह का क्रियाकर्म ही होना था।

ऐसे समय में दवाई, राशन, सब्जी, दूध आदि की डिलीवरी को सुचारू रूप से संभाले रखा डिलीवरी बॉयज ने। दवाइयाँ अविलंब पहुँचाने का प्रणाम करने योग्य कार्य किया दवाई विक्रेता ने। हम अपने घरों में सुरक्षित रह सके पुलिस कर्मियों के अथक प्रयास के कारण।

ठीक इसी प्रकार से हम लोग बिजली के सुचारू रूप से आते रहने, पानी की लगातार सप्लाई, गैस सिलेंडर का त्वरित गति से घर पर डिलीवरी होना हमारी बहुत बड़ी समस्या से हमें बचा गया।

जो लोग सोसायटी में रहते हैं उन्होंने स्वयं अनुभव किया होगा कि उनकी सोसायटी के गार्ड, मेंटिनेंस स्टाफ लगातार निःस्वार्थ भाव से पूर्ण विनम्रता के साथ पूरे लॉक डाउन सोसायटी में उपस्थित रह कर बिजली, पानी, सफाई और मेन गेट की व्यवस्था से लेकर हर ब्लॉक में सीनियर सिटीजन की सहायता करना, सीनियर सिटीजन  के घर की राशन सब्जी आदि की डिलीवरी को बिना किसी ना-नुकुर के उनके घर पहुँचाता रहा।

क्या इन सभी को अपनी जान की फ़िक्र नहीं थी ❓
क्या हम उन्हें उनकी सैलरी के अतिरिक्त कोई पेमेंट कर रहे थे ❓
क्या इतना सारा कार्य उनके सेवा अनुबंध का हिस्सा था ❓

एक बार सोचिएगा जरूर कि ...
★  असली अभिनंदन हमें किसका करना चाहिए
★   हमें सबसे पहला धन्यवाद किसे देना चाहिए

आपको एक प्रश्न स्वयं से अवश्य करना चाहिए कि ....
क्या हमने इन्हीं सेवाकर्मियों के समान किसी की कोई सहायता की   ❓
अगर आपको उत्तर न मिले तो ...
एक बार सच्चे दिल से इन सभी सेवाकार्यों को करने वाले कर्मियों का आभार अवश्य प्रकट कीजियेगा।

Wednesday, 12 August 2020

राधा कृष्ण या कृष्ण राधा ...

 मुझे धर्म सिर्फ इंसानियत लगता है।

धार्मिक ग्रंथ की जानकारी बस वहीं तक सीमित है जहाँ तक दादी गा कर सुनाती थी।

दुनिया भर के व्रत उपवास मेरे लिए सिर्फ रसोई का उत्सव मात्र रहे।

हर त्योहार में सदा अपना एंगल खोजती रही।

परंपराओं के फेरे में डांट फटकार खा कर भी नहीं उलझी।


अब हर जन्माष्टमी पर कान्हा नहीं बल्कि राधा याद आती हैं।

चुलबुली राधा का अक्स उभर आता करता है मन में।


कहते हैं वे उम्र में कन्हैया से बड़ी थीं।

उम्र के फ़ासला को दरकिनार करते हुए कृष्ण से प्रेम करती हैं।

यूँ तो प्रेम बड़ा या छोटा नहीं होता और न ही कम या ज्यादा होता है ....

फिर भी राधा का प्रेम कृष्ण के प्रेम से बड़ा था।

राधा ने जितना प्रेम कृष्ण से किया उसका एक हिस्सा भी कृष्ण राधा से नहीं कर पाए।


कृष्ण ने राधा से एक बार पूछा , " राधे ! मैं कहाँ नहीं हूँ ? ”

राधा ने झट उत्तर दिया, “ मेरे नसीब में। ”


अब जो नसीब में है ही नहीं उससे कैसी प्रीत !!!!!

नहीं ....

यही तो असली प्रीत है जो सदा इकतरफ़ा होती है।

यही कारण है राधा का प्रेम कृष्ण के प्रेम से कहीं अधिक बड़ा था।


कृष्ण तो एक कुशल राजनीतिक थे।

वे छल करने में प्रवीण थे।

कृष्ण जो कभी राधा की एक मुस्कान के लिए बाँसुरी बजाते थे 

वही राधा को धर्मयुद्ध रचा कर भूल गए।


राधा गाय का दूध बिलोती 

मक्खन बनाती 

गली-गली माखन भरी मटकिया लिए भटकती फिरतीं 

भीतर बाहर कृष्ण को ढूँढ़तीं,

किन्तु कृष्ण !!!!!!!

कृष्ण तो अर्जुन के सारथी बन रथ लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक 

भीष्म पितामह की शैया के गवाह बन 

अमावस्या की रात में सूर्य के प्रकट होने का चौपड़ बिछवाते रह गए।

राधा को कृष्ण भूल गए ....।


राधा को कृष्ण के साथ ही याद किया जाता है 

कृष्ण के नाम के बिना राधा को बिसरा दिया जाता है 

राधा तभी तक अपना अस्तित्व साबित कर पाती हैं जब तक वे कन्हैया के साथ होती हैं

राधा खो जाती हैं गुमनामी के अँधेरे में जब कृष्ण साथ नहीं होते।


आज भी कृष्ण का आदि अंत जानते हैं लोग 

राधा को कोई नहीं जानता वे कहाँ से आईं और कहाँ गईं ....।


राधा !

प्रेम तुम्हारा ही विशाल है 

जो लेना नहीं देना जानता है।


तुम लाख छली जाओ राधे ! 

भले ही जग में पागल कहलाओ, 

फिर भी राधे !

तुम्हीं ने सच्चा प्रेम कृष्ण से किया है।

Saturday, 8 August 2020

वक्त

 तूफान आये तो मुझे आवाज़ देना

ऐसा कहा था उसने 


तन्हाई हो तो पुकारना मुझे 

यह भी कहा था उसने 


दुश्मन ही सही पर भरोसा रखना 

दोस्त हूँ और दोस्ती निभाना आता है मुझे


कई तूफान आये 

तन्हाई बेहिसाब दिल में घर बना बैठी 

दोस्त दुश्मन बने

भरोसा चकनाचूर हुआ 


न मुझे उसकी याद आई 

न उसने मुझे याद किया 


नाम तक एक दूसरे का 

बिसरा दिया हमने 


प्रिय वक्त !!

देखो ....

तुमने मुझे मुझसे ही जुदा कर दिया।

Thursday, 6 August 2020

मैं

वक़्त बदला
रिश्ते बदले
राहें बदली 
नहीं बदली 
तो ...
मैं !

लकड़ी जली
कोयला भयी 
राख उड़ी
नहीं बदली 
तो ...
मैं !!

सावन आया 
भादों आया 
पतझड़ लाया 
नहीं बदली 
तो ...
मैं !!!

युग बदले 
लोग बदले 
साथी बदले 
नहीं बदली 
तो ...
मैं !!!!


Tuesday, 4 August 2020

मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी



बचपन से दादी को रामचरितमानस का पाठ करते हमेशा पाया। वह खाली बैठी कोई न कोई प्रसंग चौपाई दोहे सहित गा कर सुनाती और साथ ही अर्थ भी बतातीं। अकेली होती तो सिर्फ चौपाइयाँ गा रही होतीं। कहते हैं रस्सी की लगातार रगड़ से पत्थर पर निशान पड़ जाता है। वही हुआ भी। बिना किसी धर्म/जाति के भेद को जाने मुझे भी रामचरितमानस से लगाव हो गया। यह धार्मिक होने के लिए दी जाने वाली प्रक्रिया निश्चित रूप से नहीं थी। यह मेरे लिए एक सामान्य जीवनशैली रही जिसमें राम और सीता परिवार के सदस्य की जगह स्थापित रहे। रामचन्द्र और सीता जीवन के प्रवाह की हर लहर में मेरे माता-पिता के साथ सबसे ऊपर रहे।

धर्म की हमारे समाज में प्रचलित अवधारणा से भय लगता था। धर्म का असली अर्थ समझे बिना ही लोग धार्मिक बन गए और मारो, काटो,लूटो को गर्व से इस्तमाल करते रहे हैं। 

आस्तिक और नास्तिक दो ही पंथ हैं। जो आस्तिक है वह ईश्वर नाम की सत्ता में भरोसा करता है किंतु नास्तिक ईश्वर के होने की अनवरत घोषणा करता है। घोषणा उसी के बारे में की जा सकती है जिसका कोई अस्तित्व हो। मेरे हिसाब से नास्तिक सबसे बड़ा आस्तिक है।

ख़ैर .... अब क्योंकि अजुध्या ( अयोध्या ) मेरा गृहनगर है सो राम मंदिरों में बन्दगी करने जाना लगातार चलता रहा। गली दर गली घूमते शीश महल , सीता रसोई आदि दिखलाने ले जाना मेहमानदारी का एक प्रमुख अंग था। तमाम रिश्तेदारान आते ही अजुध्या दर्शन के लिए ही थे। 

फैज़ाबाद जिसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया है, में सरयू नदी के किनारे गुप्तारघाट है जहाँ रामचन्द्र जी ने सीता माता के धरती में प्रवेश करने पश्चात अपना धनुष कंधे से उतार कर रख दिया था और उसके पश्चात उसे कभी हाथ में नहीं लिया। इसी गुप्तारघाट से होकर बहती सरयू नदी में रामचन्द्र जी अदृश्य हो गए थे जिसके कारण से इस घाट का नाम गुप्तारघाट पड़ा। राजा साहब अयोध्या के द्वारा बनवाया भव्य मंदिर है यहाँ।



अजुध्या में कनक भवन है जिसे महाराज दशरथ ने माता सीता को विवाहोपरांत मुँह दिखाई की रस्म में उपहार में दिया था। मंदिर में बहुत बड़ा आँगन है जो मंदिर को आध्यात्मिक पुट देता है। अक्सर लोग यहाँ बैठ कर ध्यान केंद्रित करते और अपने भीतर के तमाम आवेगों को शांत करते हैं।

हनुमानगढ़ी के विषय में प्रसिद्ध है कि हनुमान जी ने स्वयं अजुध्या की रक्षा करने के लिए सबसे ऊंचे भवन की कामना की थी। मंदिर में पहुँचने के लिए सीढ़ियों का मेला है। चढ़ते जाओ, थक जाओ पर अंत नहीं दिखाई देता।

रामजन्मभूमि और मस्जिद के बीच इतनी दूरी बढ़ी कि जो कल तक दोस्तों का दोस्त समझा जा रहा था वही आपस बोलने से डरने लगा। विवाद लंबा चला। फैसला भी आया और अंततः रामजन्मभूमि का भव्य मंदिर निर्माण की समस्त प्रक्रिया चल पड़ी।

मेरे लिए रामजन्मभूमि का नवनिर्माण धर्म, आस्था से परे की बात है। मुझे दिखाई दे रहा है कि इस तीन वर्ष के निर्माण कार्य के दौरान अनेक प्रकार के रोजगार के अवसर उपलब्ध हो जायेंगें। प्रस्तावित होटल निर्माण, रिसॉर्ट्स का बनाया जाना, रेलगाड़ियों के नए फेरे लगाने की योजना, बस की संख्या का बढ़ाया जाना, हवाई यात्रा का प्रारम्भ होना निश्चित रूप से रोजगार दिलवाएगा। वर्षों से ठहरी पड़ी ज़िन्दगी दौड़ पड़ेगी। जब मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हो जायेंगीं तो कारखानों, उद्योगों के आगमन की आहट भी शीघ्र सुनाई देगी। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जीवन की बेहतरी के अवसर अवश्य उपलब्ध होंगें। यहाँ के निवासियों की जीवनशैली में सुधार होगा।

राम मंदिर निर्माण की यह भोर हम सबके जीवन में नया उज्ज्वल सवेरा लाये ऐसी कामना के साथ आप सबको बधाई प्रेषित करती हूँ।

समाचारों के विभिन्न पेज से कुछ फोटो का संकलन किया है।
आप भी चाहिए तो देखिए।


Monday, 3 August 2020

भीड़ के बीच रहती है तन्हाई



कुछ वक्त पहले मैं सुबह ही शॉपिंग करने गयी थी। बाज़ार जिस समय खुले उसी समय जाने से एक तो भीड़ कम होती है और दूसरे खुद का मस्तिष्क भी बवंडर से खाली रहता सो बेस्ट चॉइस का ऑप्शन सजग रहता है तथा तीसरे सेल्समैन भी शुरुआती ग्राहक को अटेंड करते समय पिछले दिन के ग्राहक की पसन्द के प्रभाव में नहीं रहता।

ख़ैर ....  मुझे आपको ख़रीदारी का तरीका / माहौल नहीं समझाना है ... मेरी मूल बात से भटकने की आदत है सो भटक गयी।

Bata में चप्पलें देख रही थी। अचानक एक सेल्समैन आया और बोला आपको मैडम बुला रही हैं। मुझे समझ नहीं आया कि कौन सी मैडम पर गयी। देखा एक उम्रदराज महिला बेंच पर बैठी हुई पर्स देख रही हैं। मुझे देखकर बहुत प्यार से मुस्कुरा कर उन्होंने हेलो कहा। उनका चेहरा देख कर मुझे लगा मानो वो मुझे बचपन से जानती हैं। उन्होंने ने मुझसे हाथ में लिया हुआ पर्स दिखा कर पूछा ," Is this of pure leather ?" मुझे थोड़ा hesitation हुआ पर मैंने कहा , " No, Ma'am " ...  मैंने माफ़ी माँगती नज़रों से सेल्समैन की तरफ देखा। दो-तीन बैग उन्होंने और दिखवाये। फिर मुझसे पूछा , " क्या मुझे हज़रतगंज हलवासिया में देखना चाहिए ? मुझे एक बड़े बैग की जरूरत है जिसमें मैं अपने धूप और शेड के चश्मे रख सकूँ , दवाइयाँ रख सकूँ , एक पानी की बोतल भी साइड में लगा सकूँ, वो बैग कम से कम एक साल तो चल जाये क्योंकि उसके बाद तो हो सकता है कि ..." मैंने उन्हें आगे बोलने से रोका, " Ma'am I wish you bestest health and happiness" ... उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने पास बिठा लिया। अपने बारे में काफी कुछ बताया। वो लखनऊ के IT College के ऑफिस में कार्य करती थीं। वहीं से रिटायर हुई थीं। उनका अपना मकान उन्होंने बेच दिया और अपने बेटे को उस पैसे से विदेश पढ़ाई करने भेज दिया था। बेटा वहीं बस गया कभी लौटा ही नहीं। और भी बहुत सारी बातें वो करती रहीं। मुझसे पूछा क्या मैं ईसाई हूँ पर मेरे न बोलने से कुछ निराश हुईं पर संभल गयीं। फिर खुद ही बोलीं , " You look like Catholic. Polite and well behaved. I am very fond of talking , meeting people."  न जाने कितनी बातें उन्होंने की जिनका ज़िक्र बहुत लंबा हो जाएगा। एक घंटा कबका बीत गया था। बेचारा सेल्समैन अधीर होने लगा। अचानक उनकी तन्द्रा टूटी तो तमाम आशीर्वाद देती वे चली गईं। मैं बिल का भुगतान करने गयी तो मैनेजर बताने लगा कि कहीं आसपास ही रहती हैं किसी पी जी में। अक्सर आती हैं। सामान देखती हैं। कोई मिल गया तो उससे बातें करती हैं और चली जाती हैं बिना कुछ खरीदे।



कितने अकेले हैं लोग। 
हो सके तो अकेलापन पहचानिए।
कोई यूँ ही नहीं अजनबियों से बातें करता है।
कभी किसी का असामान्य व्यवहार भी बारीकी से अनुभव कीजिये।
यहाँ फेसबुक पर एक ही दिन में बीसियों पोस्ट करने वाले मिल जायेंगें ... जिनकी हर पोस्ट कुछ सारगर्भित हो , उनके आचरण को अनुभव कीजिये ... कहीं ऐसा तो नहीं वे अकेलेपन से जूझ रहे हों।
भीड़ के बीच भी इंसान अकेला होता है , यह याद रखिये।
आपका दो पल शायद उन्हें कोई ख़ुशी दे जाये।

Saturday, 1 August 2020

सेंध लग गयी ...






सदियों से चली आ रही है वह प्रथा जिसमें पुरुषों का घर में सहयोग बच्चों, स्त्रियों की रक्षा व आर्थिक सहयोग अघोषित नियम के तहत स्थापित है। आर्थिक सहयोग के बिना घर गृहस्थी का संचालन असम्भव होता है। घर के हर कोने-अतरे का विभाजन अघोषित रूप से कर लिया गया था जिसके परिणामस्वरूप स्त्रियाँ घर की चौहद्दी के भीतर अदृश्य लक्ष्मण रेखा के भीतर रहती चली आईं। रसोई, वस्त्रों की धुलाई, घर की साफ-सफाई आदि कार्य आये स्त्रियों के जिम्मे और पुरुषों के लिए बने वर्जित क्षेत्र।

इसी वर्जित क्षेत्र में सेंध लगा दी हमारे आम घरों के पुरूषों ने।  लॉक डाउन के दौरान पुरूषों का एक बहुत बड़ा वर्ग सफलतापूर्वक इन वर्जित क्षेत्रों में न केवल अपनी उपस्थिति महसूस करवा सका बल्कि अपने कौशल को यहाँ भी स्थापित कर पाया।



घर की सफाई , साज सज्जा से लेकर दिल में उतरने की कला के रास्तों की खुद से पहचान करवाई और कठिन परिश्रम से विभिन्न व्यंजनों के स्वाद को हवा में दूर-दूर तक फैला दिया। 



कई पुरुषों ने अपनी माँ और दादी-नानी की रेसिपी को साधा। कुछ ने यूट्यूब का सहारा लिया, कुछ ने विभिन्न रेसिपी एप्प डाउनलोड करके जायके के सफर को हमसफ़र बनाया।



फेसबुक , ट्विटर, इंस्टाग्राम पर पुरुषों ने अपनी पाककला की मजबूत दावेदारी पेश की। आज उनकी जबरदस्त फैन फॉलोइंग है।

चित्र मिल्क पाउडर से बने मथुरा पेड़े का है।


फेसबुक पर मुकेश कुमार सिन्हा जहाँ एक तरफ कलम के धनी हैं वहीं दूसरी ओर उनकी पाककला अपना परचम लहरा रही है। पाककला के शौकीन तो वे कोरोनो काल से पहले ही रहे हैं किंतु लॉक डाउन के दौरान उनका परंपरागत मिठाइयों अच्छे-अच्छे हलवाई को भी शर्मिंदा कर दे।

रश्मि रविजा के पुत्र कमाल की डिश बनाते हैं जिसे रश्मि अक्सर अपने पटल पर साझा करती हैं। उनके व्यंजनों की प्रस्तुति बहुधा एक्सपर्ट शेफ सरीखी होती हैं।

संध्या जैन के पुत्र अक्सर नई-नई डिश बनाते हैं। संध्या का उल्लास झलकता है उन व्यंजनों की कहानी फेसबुक पर सुनाते हुए।

मेरा अपना बेटा बेकिंग एक्सपर्ट हुआ जा रहा है। नए-नए प्रयोग उसे भाते हैं। सामग्री को अदल बदल करना, उनकी माप तौल को घटा-बढ़ा कर उसे बेहतरीन स्वाद को ला कर ही उसे संतुष्टि मिलती है।

चित्र मेरे बेटे के बनाये पहले केक का है।

बीन्स और आलू : प्रथम प्रयास 


स्वीट कॉर्न इन सॉस एंड चीज़ विथ क्रीम 

Cheesy Pasta : First Attempt

Pizza of choice 

स्त्रियों के साम्राज्य वाले पुरुषों के लिए वर्जित क्षेत्र में सेंध तो लग ही गयी और बहुत खूब लगी ☺️

The Legend: Sachin Tendulkar

Over the years, Tendulkar has forged his name in history as the ‘The Greatest Batter of all time’ and he also got nicknamed as The ‘Master B...