चौपाल नीता की ...

Thursday, 10 September 2020

उपवास अपने-अपने

 


यूँ तो मैंने कभी किसी भी प्रकार का व्रत उपवास नहीं किया पर व्रत का भोजन खूब बनाया और खाया है।


संतोषी मम्मी का व्रत मुझे इसलिए अच्छा लगता कि व्रत करने वालों के लिए बने तीखी लाल मिर्च और नमक से छौंके समोसे जैसे छोटे छिलके सहित आलू और भाड़ से भुने चने होते थे। वो मैं भी लंच स्किप करके प्लेट भर खा जाती थी।


करवाचौथ, तीज का व्रत इसलिए अच्छा लगता क्योंकि फीकी बड़ी-बड़ी मठ्ठी , गुड़ की करारी बड़ी-बड़ी मठ्ठी और खजूर जिसे बिहार में ठेकुआ कहते हैं, खाना बहुत पसंद था। ये मठ्ठी बड़े मजेदार तरीके से बनाई जाती थी। मैदे का कड़ा आटा दो तरीके से गूँधा जाता। एक सादा फीकी मठ्ठी के लिए और दूसरा गुड़ के पानी से गूँधा जाता। इस आटे की एकदम पतली मठ्ठी बेली जाती। धूप में चारपाई पर कपड़ा बिछा कर सूखने के लिए फैला दी जातीं। चार पांच घण्टे में वे उलट-पलट करते सूख जातीं। फिर उन्हें धीमी आँच पर तल लिया जाता। यह मठ्ठी आराम से दस बारह दिन चलतीं। हम उनके लिए सूखा आलू लाल मिर्च वाला ख़ास बनवाते और आलू , बुकनू और मठ्ठी की दावत उड़ाते। 


गुरुवार का व्रत इसलिए अच्छा लगता कि बेसन का करारा लालोलाल पराठा और दही चीनी में हिस्सा-बाँट करने को मिलता।


ऐसे ही अनेक व्रत उपवास हमारी दावत का इंतज़ाम कर देते। 

सो कुल मिला कर मुद्दा ये कि हम व्रत उपवास नहीं करते पर कोई करता है तो कोई आपत्ति कम से कम हमें नहीं होती। 


ये सब अपनी-अपनी आस्था-विश्वास की बात होती है जिसे हम कैसे तोड़ सकते हैं।


हाँ ये जरूर है कि कोई व्रत नहीं करना चाहता किन्तु ज़बरन करवाया जा रहा हो तो विरोध करने को प्रथम पंक्ति में खड़े होने से भी नहीं चूकेंगें।

पिता


पिता कभी नहीं जानते कि 

               “ बेटियों के लिए वह क्या हैं।”


पिता होते हैं तो बेटी को मिलता है एक घरौंदा,

पिता होते हैं तो बेटी को मिलते हैं मिट्टी के वे खिलौने जिनसे वह संसार बसाना सीखती है ,

पिता होते हैं तो बेटी को मिलती है वह तख़्ती और दवात जिसमें सेठे की कलम नीली स्याही में डुबो कर बेटी अपने आँचल में भर लेती है खुला आकाश।


हर रिश्ते की नींव का पहला ईंटा पिता धरते हैं ...

उन रिश्तों से मिलता है बेटी को जगमगाते उपवन का साथ,

पिता ही देते उस उपवन का सबसे सुंदर गुलाब बेटी को ...

जो देता है आश्वासन जीवन भर मायके की देहली भाई से रहेगी आबाद।


पिता ही होते हैं विशाल हृदय के स्वामी जो 

बेटी की हर गलती को बदल कर उसे ही बना देते हैं 

आगे बढ़ने का मार्ग,

हर कदम साथ रहकर 

अपना हाथ बेटी के सिर पर रखकर 

“ मैं हूँ ” का दम हैं भरते।


माँ तो जीवन भर व्यस्त रहती है बेटी को संस्कार देने में

किन्तु पिता !!

पिता ही ससुराल के हर बोझिल कदम को हैं सहज करते,

बिदाई में जब माँ चुपके से पल्लू में बेटी की एक ही सीख है बांधती - “ जा लाड़ो, अब वही है तेरा संसार ”

वहीं पिता अडिग चट्टान बन आश्वस्त करते, 

“ आ जाना बार-बार मेरे पास मेरी लाड़ो !! ”


पिता का जाना ...

बेटी का आधा घर ढहा देता है,

वह रीत जाती है कहीं भीतर तक ...

संस्कारों की भीड़ में तलाशती है जीवन भर 

अपने उसी आश्वस्त करते हाथ को जो ...

सिर्फ और सिर्फ 

एक पिता ही दे सकते हैं।


पिता के साथ 

कहीं बेटी भी तो नहीं चली जाती है .......



Friday, 4 September 2020

वन्दन हे गुरुवर !!


 जिनके क़िरदार से आती हो सदाक़त की महक,

उनकी तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं।

गुरू वह जो आपके क्षणांश को भी  उत्कृष्टता की ओर जाने को प्रेरित ही न करे बल्कि आपको उसे लक्ष्य बना कर हासिल करना सिखाये।

प्रथम गुरु माता और द्वितीय गुरु पिता जो हमें इस लायक बनाते हैं कि हम दुनिया के सामने प्रस्तुत हो सकें।




हमारी पहली तख़्ती/सुलेख-पुस्तिका पर पहली डंडी खिंचवाने वाले हमारी पाठशाला के वह शिक्षक जिनका बहुधा हम नाम भी भूल गए होते हैं।

हमारी समस्त शैक्षिक यात्रा में हमारे बेहतरीन गुणों को तराशने और सँवारने वाले शिक्षकों का योगदान उनका आजीवन ऋणि बने रहने के लिए भी कम है।

हमारी जीवन यात्रा में बाह्य संसार के अनजान और पहचाने इंसान जो जीवन की ऐसी दुर्लभ और अमूल्य शिक्षा हमारे दैनिक आचार-व्यवहार पर जाने-अनजाने दे जाते हैं।

इन सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस पर वन्दन , नमन , सादर प्रणाम !!


बेटी भी आपका हिस्सा है ...


 

सोचा था आजीवन पितृ पक्ष पर मुँह नहीं खोलूँगी। इस बार नहीं रहा गया सो कुछ कहना ही चाहती हूँ क्योंकि बिना कहे चली गयी तो क्या पता भूत बन जाऊँ। हाँ सच्ची !! भूत अतृप्त आत्मायें ही तो बनती हैं। 

पितरों का आगमन और बड़ी भारी तैयारी देखते थे हम बच्चे और दो या शायद तीन वर्षों तक यही समझते कि दीवाली या दशहरे जैसा कुछ होता होगा। कभी किसी ने बताया ही नहीं। दादी जो हमेशा हर वार-त्यौहार को तमाम कहानियाँ सुना कर, पकवान बनाते समय समझा कर बताती थीं कि हर छोटी बात भी मन में बैठ जाती थी, वह भी कुछ नहीं बोलतीं थीं। अम्माँ से पूछने का अर्थ सीधे कोने में मुँह करके खड़े हो जाओ की सजा मिलना सो उनसे तो दूर ही भागते हम सब। सिर्फ एक हिदायत मिलती और बार-बार मिलती कि लड़कियाँ किसी भी चीज को तब तक हाथ नहीं लगायेंगीं जब तक कहा न जाये। होश में आने के बाद पहले यह समझ में आया कि भाई लोगों को अधिक प्रेम करते हैं सब लोग। फिर समझ में आया कि लड़कियाँ बेकार होती हैं। दो एक साल बीते तो सीधे संवाद सुनाई दिए, “ लड़कियाँ पराया धन हैं। उन्हें पितरों के तर्पण, ब्राह्मण भोज की रसोई, ब्राह्मण दक्षिणा को छूने का अधिकार नहीं है। वे अपने घर जायेंगी तब अपने पितरों की सेवा करेंगीं।”

यह बहुत बड़ा झटका था। यहीं से पराया घर और अपना घर की परिभाषा बदलने की नींव पड़ी और जिसे दादी व अम्माँ कहतीं “ विद्रोहिणी का जन्म हुआ ” के नाम से प्रसिद्ध हुई। जो हमारे परिवार के सदस्य थे और पितरों में जा मिले वो अचानक कैसे लड़कियों को पराया कर गए ... यह बहुत बड़ा प्रश्न सामने आ खड़ा हुआ जिसका उत्तर देने वाला कभी नहीं मिला।

मेरे पिताजी जब नहीं रहे तो सबसे पहला बदलाव मैंने किया जिसमें मेरे भाई की पूर्ण सहमति थी और शेष परिवार की घोर नाराजगी थी कि पूरे शोक के वक्त की भाई की रसोई मैंने और मेरी बहन ने बनाई। दसवें वाले दिन जो घाट पर भोजन की पत्तल जाती है वह हम दोनों ने बनाई। तेरहवीं का ग्रन्थ साहब का भोग बनाया। जब उनकी श्राद्ध का वक्त आया तो तर्पण और अन्य विधि विधान किये। ब्राह्मणों का विरोध हुआ। हमारे यहाँ पण्डित जी ग्यारह ब्राह्मणों के साथ जीमने आते थे। उनकी मण्डली किसी भी तरह मान ही नहीं रही थी कि बेटी के हाथ का बनाया भोजन ग्रहण किया जाये। हमारे कुल परोहित जो उत्तराखंड के निवासी थे, सबको समझाया और भोजन स्वीकार करने के लिए तैयार किया। पहले वर्ष कुछ नाराजगी वाला माहौल रहा फिर अगले वर्ष से सब राजी खुशी हुआ। तीसरे वर्ष सुनने में आया कि तीन चार और परिवारों में बेटियों को सम्मलित किया गया है। फिर यह एच्छिक हो गया।

भाई जब गया तो दाह संस्कार से लेकर सभी विधियाँ भतीजे के साथ की। विरोध नहीं घोर विरोध सहा पर सब किया।

आ गया पितृपक्ष जो मेरे लिए अपनी श्रद्धा अपने दिवंगत प्रियजनों के प्रति प्रकट करने का विशेष अवसर है। यह वही श्रद्धा है जिसे मेरी अम्माँ भी अपने पति और पुत्र के लिए समर्पित करना चाहती हैं। अम्माँ के लिए तो वे प्रतिदिन की पूजा में देवता का स्थान ले चुके हैं। मेरी बहन जो अपनी ससुराल में है वह भी अपनी इच्छानुसार अपना सम्मान प्रकट करती है। 

बेटी भी आपका ही हिस्सा है। 

वह भी आपसे उतना ही प्रेम करती है जितना आपका पुत्र करता है।

उसे पराया मत कीजिये।


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