यूँ तो मैंने कभी किसी भी प्रकार का व्रत उपवास नहीं किया पर व्रत का भोजन खूब बनाया और खाया है।
संतोषी मम्मी का व्रत मुझे इसलिए अच्छा लगता कि व्रत करने वालों के लिए बने तीखी लाल मिर्च और नमक से छौंके समोसे जैसे छोटे छिलके सहित आलू और भाड़ से भुने चने होते थे। वो मैं भी लंच स्किप करके प्लेट भर खा जाती थी।
करवाचौथ, तीज का व्रत इसलिए अच्छा लगता क्योंकि फीकी बड़ी-बड़ी मठ्ठी , गुड़ की करारी बड़ी-बड़ी मठ्ठी और खजूर जिसे बिहार में ठेकुआ कहते हैं, खाना बहुत पसंद था। ये मठ्ठी बड़े मजेदार तरीके से बनाई जाती थी। मैदे का कड़ा आटा दो तरीके से गूँधा जाता। एक सादा फीकी मठ्ठी के लिए और दूसरा गुड़ के पानी से गूँधा जाता। इस आटे की एकदम पतली मठ्ठी बेली जाती। धूप में चारपाई पर कपड़ा बिछा कर सूखने के लिए फैला दी जातीं। चार पांच घण्टे में वे उलट-पलट करते सूख जातीं। फिर उन्हें धीमी आँच पर तल लिया जाता। यह मठ्ठी आराम से दस बारह दिन चलतीं। हम उनके लिए सूखा आलू लाल मिर्च वाला ख़ास बनवाते और आलू , बुकनू और मठ्ठी की दावत उड़ाते।
गुरुवार का व्रत इसलिए अच्छा लगता कि बेसन का करारा लालोलाल पराठा और दही चीनी में हिस्सा-बाँट करने को मिलता।
ऐसे ही अनेक व्रत उपवास हमारी दावत का इंतज़ाम कर देते।
सो कुल मिला कर मुद्दा ये कि हम व्रत उपवास नहीं करते पर कोई करता है तो कोई आपत्ति कम से कम हमें नहीं होती।
ये सब अपनी-अपनी आस्था-विश्वास की बात होती है जिसे हम कैसे तोड़ सकते हैं।
हाँ ये जरूर है कि कोई व्रत नहीं करना चाहता किन्तु ज़बरन करवाया जा रहा हो तो विरोध करने को प्रथम पंक्ति में खड़े होने से भी नहीं चूकेंगें।



