उम्र की दहलीज़ पे मेरी
खड़े होगे तो पाओगे
क्या खोया,
क्या पाया ...।
सालता रहेगा
शेष उम्र
दुःख ये
साल दर साल ...।
रीत रहा होगा
वक़्त !
बदल रही होगी
उम्र !
फिर भी
सवालों में उलझे
खुद को पाओगे।
थाम कर रखना
यादें गुज़रे साये की,
शेष बची सांसों संग
तब भी ...
शायद ही ...
जी पाओगे।
सहारा जो बनते थे
कितने बेगानों के भी ..
तलाश में
खुद को
भटकते इक सहारे के
हर पल पाओगे।
लाचारी
बेबसी
दया
जो भीख लगती थी ...
अब उसी को
अमानत समझ
उठा लाओगे।