चौपाल नीता की ...

Sunday, 23 May 2021

नमस्कार


 कुछ स्त्रियाँ एक नदी के तट पर बैठी थी। वे सभी धनवान व सुंदर भी थीं।  वे नदी के शीतल एवं स्वच्छ जल में अपने हाथ - पैर धो रही थीं और पानी में अपनी परछाई देखकर अपने सौंदर्य पर स्वयं ही मुग्ध हो रही थीं।

तभी उनमें से एक ने अपने हाथों की प्रशंसा करते हुए कहा, “ देखो, मेरे हाथ कितने सुंदर है।” दूसरी स्त्री ने दावा किया कि उसके हाथ ज्यादा खूबसूरत हैं तीसरी स्त्री ने भी यही दावा दोहराया।

उनमें इस पर बहस छिड़ गई तभी एक बुजुर्ग स्त्री लाठी टेकती हुई वहाँ से निकली। उसके कपड़े मैले- कुचैले थे वह देखने से ही अत्यंत निर्धन लग रही थी।

उन स्त्रियों ने उसे देखते ही कहा, “ बहस छोड़ कर चलो इस बुढ़िया से पूछते हैं कि हममें से किसके हाथ सबसे अधिक सुंदर हैं।”

उन्होंने बुजुर्ग महिला को पुकारा, “ ओ बुढ़िया, जरा इधर आकर ये तो बता कि हममें से किसके हाथ सबसे अधिक सुंदर हैं।”

बुजुर्ग किसी तरह लाठी टेकती हुई उनके पास पहुंची और बोली, “ मैं बहुत भूखी हूँ। पहले मुझे कुछ खाने को दो, कुछ पेट में जाये तभी कुछ बता सकूँगी।” ”

वे घमण्डी स्त्रियाँ हँस पड़ी और बोलीं, “ जा भाग, हमारे पास कोई खाना-वाना नहीं है। ये भला हमारी सुंदरता को क्या पहचानेगी।”

वहीं थोड़ी ही दूरी पर एक मजदूर महिला बैठी थी वह देखने में सामान्य लेकिन मेहनती और विनम्र थी। उसने बुजुर्ग को अपने पास बुलाकर प्रेम से बैठाया और अपनी पोटली खोलकर अपने खाने में से आधा खाना उसे दे दिया फिर नदी से लाकर ठंडा पानी पिलाया। उस मजदूर महिला ने उसके हाथ-पैर धोए और अपनी फटी धोती से पोंछकर साफ कर दिए इससे बुजुर्ग महिला को बड़ा आराम मिला।

जाते समय वह बुजुर्ग उन सुंदर महिलाओं के पास जाकर बोली , “ सुंदर हाथ उन्हीं के होते हैं जो अच्छे कर्म करें तथा जरूरतमंदों की सेवा करें। अच्छे कार्यों से हाथों का सौंदर्य बढ़ता है, आभूषणों से नहीं।”

गरीब और असहाय लोगो की हमेशा मदद करनी चाहिए जिससे आपके कर्मों की सुंदरता निखरती चली जाए।

सुबह की चाय,
साथ हो अख़बार,
एक सुविचार, 
चिंतन मनन का अधिकार ...
सब है तो 
हमारे - आपके पास।

Bohra Sisters की शानदार प्रस्तुति वाले Doodle के साथ सुबह की 
नमस्कार
   🙏🏻


Friday, 21 May 2021

कोरोना तेरे आफ्टर इफेक्ट

समाजसेवी युवा लोगों का एक ग्रुप वैन द्वारा खाद्य सामग्री बांट रहा था।

भीड़ वैन को घेरे हुई थी। 

दूर से एक खिड़की का पर्दा जरा सा खिसकाए एक स्त्री झिर्री में से झांक रही थी। वह इन्टर कॉलेज की अध्यापिका थीं जो वेतन न मिलने के कारण आर्थिक रूप से परेशान थीं, किन्तु अपनी परेशानी किसी से बता भी नहीं पा रही थीं। बीमार पति और दो छोटे बच्चों व बूढ़े सास ससुर के पालन-पोषण व इलाज की जिम्मेदारी में संचित धन खत्म होने को आ गया था।

एक युवक की नजर उन पर पड़ी और उसने अपने पास खड़े दो युवकों को धीरे से वह दिखाया।

युवक-युवतियों ने आपस में निर्णय किया और वैन पर लगे “ मुफ्त सहायता ” वाले बैनर को उतारा और पलट कर उसी कपड़े पर लिखा, 

“ आलू, प्याज, टमाटर, तरोई, लौकी, कद्दू, अमरूद का आज का भाव : मात्र 7 रुपये किलो।

आटा, अरहर दाल, चावल का आज का भाव : 10 रुपये किलो।

तेल : 11 रुपये लीटर केवल आज 

नमक 1 किलो, मिर्च पाउडर 100 gm , हल्दी पाउडर 100 gm आज मात्र  7 रुपये में।

शक्कर एक किलो : 10 रुपये

चाय की पत्ती:  मात्र 9 रुपये की 900 gm ”


दस पंद्रह मिनट में भीड़ के बीच झिर्री वाली आंखों वाली महिला सिर झुकाए, तनाव से भरी हुई आई और सब्जी, अनाज, तेल खरीद ले गयी।

जाते समय उसके मुँह पर संतोष का भाव था।


युवकों ने उससे प्राप्त रुपये दान पेटी में डाल दिये और बैनर उल्टा करके टांग दिया 

“ मुफ्त सहायता ”

Wednesday, 19 May 2021

मध्यम वर्ग और कोरोना

कोरोना को भारत में आये करीब डेढ़ साल होने को आये। स्वास्थ्य ही नहीं उसने तो जीवन के हर क्षेत्र को अपने कंट्रोल में ले लिया है। हर तरफ हाहाकार है, कोहराम है। किल्लत में बिना किसी की सहायता के नहीं चलता फिर ये तो किल्लत की सिरमौर समस्या है जिसमें हर तरीके की दुश्वारियाँ हैं।

किसी की सहायता करने से अक्सर इच्छा होते हुए भी इंसान पीछे हट जाता है क्योंकि उन्हें पता होता है कि उस कार्य में धन लगता है। 

हर कोई धनाढ्य नहीं होता और अगर है भी तो परोपकार की भावना से युक्त नहीं होता।

और आख़िरी सबसे महत्वपूर्ण बात जिसे अंडरलाइन में देखिएगा कि लगभग सभी ने या आधे लोगों ने नोटबन्दी के समय से अपने संचित धन में लगातार कमी होती ही देखी है। पहले लॉक डाउन के समय से तो लाल रेखा ग्राफ पर तेजी से पाताल लोक से गले मिलने दौड़ी जा रही है।

मैं निजी तौर पर इस समय ऐसे कई परिवारों को जानती हूँ जिनकी आमदनी शून्य हो चुकी है और संचित धन चंद दिनों का मेहमान है।

मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या मानसिक होती है कि न तो वे स्वयं को निम्न आयवर्ग में रखकर तदनुसार आचरण कर पाते हैं कि मुफ्त मिलने वाला सरकारी राशन ही आगे बढ़कर सहायता वैन से ले पायें, 

और ...

न ही इतनी हिम्मत होती है कि बैंक में खुद को गरीब घोषित कर प्रधानमंत्री सहायता और मुख्यमंत्री सहायता ही पा कर कम से कम बुखार की पैरासिटामोल ही खरीद पायें। 

ये बस धनाढ्य वर्ग कार्बन कॉपी बनने और नकली शो बाजी वाली  ज़िन्दगी जीने के फेर में अपनी ज़िंदगी दुश्वारियों से भर देते हैं।

साथ पुरवाने को होते हैं कुछ एक्सकलमेटरी शब्द और नीचा दिखाती नज़रें। अगर सिंहासन से उतरना भी चाहें तो दूसरे उनके पैर के नीचे की जमीन खींच लेने को तैयार बैठे होते हैं।

अब ऐसे में किसी दूसरे की सहायता भला कौन करेगा जबकि वह अपनी ही सहायता नहीं कर पा रहा।


The Legend: Sachin Tendulkar

Over the years, Tendulkar has forged his name in history as the ‘The Greatest Batter of all time’ and he also got nicknamed as The ‘Master B...