कुछ स्त्रियाँ एक नदी के तट पर बैठी थी। वे सभी धनवान व सुंदर भी थीं। वे नदी के शीतल एवं स्वच्छ जल में अपने हाथ - पैर धो रही थीं और पानी में अपनी परछाई देखकर अपने सौंदर्य पर स्वयं ही मुग्ध हो रही थीं।
Sunday, 23 May 2021
नमस्कार
कुछ स्त्रियाँ एक नदी के तट पर बैठी थी। वे सभी धनवान व सुंदर भी थीं। वे नदी के शीतल एवं स्वच्छ जल में अपने हाथ - पैर धो रही थीं और पानी में अपनी परछाई देखकर अपने सौंदर्य पर स्वयं ही मुग्ध हो रही थीं।
Friday, 21 May 2021
कोरोना तेरे आफ्टर इफेक्ट
समाजसेवी युवा लोगों का एक ग्रुप वैन द्वारा खाद्य सामग्री बांट रहा था।
भीड़ वैन को घेरे हुई थी।
दूर से एक खिड़की का पर्दा जरा सा खिसकाए एक स्त्री झिर्री में से झांक रही थी। वह इन्टर कॉलेज की अध्यापिका थीं जो वेतन न मिलने के कारण आर्थिक रूप से परेशान थीं, किन्तु अपनी परेशानी किसी से बता भी नहीं पा रही थीं। बीमार पति और दो छोटे बच्चों व बूढ़े सास ससुर के पालन-पोषण व इलाज की जिम्मेदारी में संचित धन खत्म होने को आ गया था।
एक युवक की नजर उन पर पड़ी और उसने अपने पास खड़े दो युवकों को धीरे से वह दिखाया।
युवक-युवतियों ने आपस में निर्णय किया और वैन पर लगे “ मुफ्त सहायता ” वाले बैनर को उतारा और पलट कर उसी कपड़े पर लिखा,
“ आलू, प्याज, टमाटर, तरोई, लौकी, कद्दू, अमरूद का आज का भाव : मात्र 7 रुपये किलो।
आटा, अरहर दाल, चावल का आज का भाव : 10 रुपये किलो।
तेल : 11 रुपये लीटर केवल आज
नमक 1 किलो, मिर्च पाउडर 100 gm , हल्दी पाउडर 100 gm आज मात्र 7 रुपये में।
शक्कर एक किलो : 10 रुपये
चाय की पत्ती: मात्र 9 रुपये की 900 gm ”
दस पंद्रह मिनट में भीड़ के बीच झिर्री वाली आंखों वाली महिला सिर झुकाए, तनाव से भरी हुई आई और सब्जी, अनाज, तेल खरीद ले गयी।
जाते समय उसके मुँह पर संतोष का भाव था।
युवकों ने उससे प्राप्त रुपये दान पेटी में डाल दिये और बैनर उल्टा करके टांग दिया
“ मुफ्त सहायता ”
Wednesday, 19 May 2021
मध्यम वर्ग और कोरोना
कोरोना को भारत में आये करीब डेढ़ साल होने को आये। स्वास्थ्य ही नहीं उसने तो जीवन के हर क्षेत्र को अपने कंट्रोल में ले लिया है। हर तरफ हाहाकार है, कोहराम है। किल्लत में बिना किसी की सहायता के नहीं चलता फिर ये तो किल्लत की सिरमौर समस्या है जिसमें हर तरीके की दुश्वारियाँ हैं।
किसी की सहायता करने से अक्सर इच्छा होते हुए भी इंसान पीछे हट जाता है क्योंकि उन्हें पता होता है कि उस कार्य में धन लगता है।
हर कोई धनाढ्य नहीं होता और अगर है भी तो परोपकार की भावना से युक्त नहीं होता।
और आख़िरी सबसे महत्वपूर्ण बात जिसे अंडरलाइन में देखिएगा कि लगभग सभी ने या आधे लोगों ने नोटबन्दी के समय से अपने संचित धन में लगातार कमी होती ही देखी है। पहले लॉक डाउन के समय से तो लाल रेखा ग्राफ पर तेजी से पाताल लोक से गले मिलने दौड़ी जा रही है।
मैं निजी तौर पर इस समय ऐसे कई परिवारों को जानती हूँ जिनकी आमदनी शून्य हो चुकी है और संचित धन चंद दिनों का मेहमान है।
मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या मानसिक होती है कि न तो वे स्वयं को निम्न आयवर्ग में रखकर तदनुसार आचरण कर पाते हैं कि मुफ्त मिलने वाला सरकारी राशन ही आगे बढ़कर सहायता वैन से ले पायें,
और ...
न ही इतनी हिम्मत होती है कि बैंक में खुद को गरीब घोषित कर प्रधानमंत्री सहायता और मुख्यमंत्री सहायता ही पा कर कम से कम बुखार की पैरासिटामोल ही खरीद पायें।
ये बस धनाढ्य वर्ग कार्बन कॉपी बनने और नकली शो बाजी वाली ज़िन्दगी जीने के फेर में अपनी ज़िंदगी दुश्वारियों से भर देते हैं।
साथ पुरवाने को होते हैं कुछ एक्सकलमेटरी शब्द और नीचा दिखाती नज़रें। अगर सिंहासन से उतरना भी चाहें तो दूसरे उनके पैर के नीचे की जमीन खींच लेने को तैयार बैठे होते हैं।
अब ऐसे में किसी दूसरे की सहायता भला कौन करेगा जबकि वह अपनी ही सहायता नहीं कर पा रहा।
The Legend: Sachin Tendulkar
Over the years, Tendulkar has forged his name in history as the ‘The Greatest Batter of all time’ and he also got nicknamed as The ‘Master B...
-
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। अवध में ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवा...
-
हम किसी के भी द्वारा की गई सहायता को,( भले ही यह उसके कार्य का/उसकी नौकरी का ही हिस्सा क्यों न हो) बड़ी आसानी से उपेक्षित कर देते हैं। ...
-
मुझे धर्म सिर्फ इंसानियत लगता है। धार्मिक ग्रंथ की जानकारी बस वहीं तक सीमित है जहाँ तक दादी गा कर सुनाती थी। दुनिया भर के व्रत उपवास मेरे ल...