“ वक्त से डरो ” कहा था किसी ने
“ कैसे डरूँ ” सोचती रह गयी थी मैं !
अब समझ में आया है कि
वक्त से डरना क्या होता है ...।
यह कोरोना काल बहुत कुछ ले जा रहा है
रिश्तों का रेला
यारी दोस्ती
दुनिया और समाज !!
सिखला भी बहुत कुछ जा रहा है
अकेले आये हो ,
अकेले जाना है
फिर क्यों भला
इस वक्त से
इतना घबराना ...
जिन खिड़कियों से
धूप सोना चांदी बिखेरती थी
अब उन पर लगा पहरा है
पर्दों की झिर्री से
अब साये ही नज़र आते हैं ...
दरवाजे अब नहीं खुलते
भीतर से बाहर
बाहर से भीतर
कदम नहीं चलते ...
सुनने को किवाड़ पर एक ठकठक
जा खड़ी होती हूँ किवाड़ के पीछे
कोई पदचाप नहीं सुनाई देती
आती ही नहीं तो भला लौटेगी कैसे ...
पड़ोस से आती सिसकियों की आवाज़
एम्बुलेंस के पहियों की चीख
मंगल ग्रह से आये जीवों से
स्वास्थ्यकर्मियों के बूट की आवाज़
दहशत फैलती है ...
घबराहट है कि थमती नहीं,
ज़िन्दगी है कि चलती नहीं,
सांस है कि थमती नहीं ...
तिल-तिल कर रोज मरने से
एक बार का “ अलविदा ” कहना बेहतर है।
दीदी आज कविता में उदासी ?
ReplyDeleteबहुत भयानक वक्त है ....
Deleteईश्वर सबको सुरक्षित रखें।
आभारी हूँ आपने मेरे अनुभवहीन लेखन को समझा।
🙏🏻
अकेले होते जा रहे समाज में सबको साथ रहने की जरूरत है। काॅल करके, वीडियो काॅल के जरिए सभी लोग जुड़े रह सकते हैं
ReplyDeleteएकदम सही कहा आपने।
Deleteआजकल की स्थिति सबको भयभीत करके अकेला कर दे रही है।
आभार आपका
Deleteना..अलविदा किसी सूरत में कुबूल नही..!
ReplyDeleteतुम तो सबको प्रेरणा देती हो नीता..😊👍
सरस जी , दिल से शुक्रिया
Deleteमन के इस द्वन्द में इस काल में सकारात्मक और नकारात्मक सोच आती है पर जीवन हारने के लिए नहीं ... अलविदा क्यों .. ये तो परीक्षा की घड़ी है ...
ReplyDeleteसाधारण इंसान अनेक संकटों से घिर गया है।
Deleteहताशा का आना स्वाभाविक है।
आभार आपका
सकारात्मक अच्छा लगा प्रांजल भाषा प्रभा पढ़कर
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया
Deleteपड़ोस से आती सिसकियों की आवाज़
ReplyDeleteएम्बुलेंस के पहियों की चीख
मंगल ग्रह से आये जीवों से
बढ़िया सृजन
हार्दिक आभार
Deleteसच में अब अवसाद बढ़ने लगा है। दुनिया को अलविदा कह दें, मन तो ज़रूर होता है। लेकिन जो समय और वक़्त आया है उससे हारना भी नहीं है। अभी के मनोविज्ञान पर बहुत अच्छी रचना।
ReplyDeleteहार्दिक आभार
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