चौपाल नीता की ...

Saturday, 18 July 2020

वक्त से डरो

“ वक्त से डरो ” कहा था किसी ने 
“ कैसे डरूँ ” सोचती रह गयी थी मैं !

अब समझ में आया है कि 
वक्त से डरना क्या होता है ...।

यह कोरोना काल बहुत कुछ ले जा रहा है 
रिश्तों का रेला 
यारी दोस्ती 
दुनिया और समाज !!

सिखला भी बहुत कुछ जा रहा है 
अकेले आये हो , 
अकेले जाना है 
फिर क्यों भला 
इस वक्त से 
इतना घबराना ...

जिन खिड़कियों से 
धूप सोना चांदी बिखेरती थी
अब उन पर लगा पहरा है
पर्दों की झिर्री से 
अब साये ही नज़र आते हैं ...

दरवाजे अब नहीं खुलते 
भीतर से बाहर 
बाहर से भीतर 
कदम नहीं चलते ...

सुनने को किवाड़ पर एक ठकठक 
जा खड़ी होती हूँ किवाड़ के पीछे 
कोई पदचाप नहीं सुनाई देती 
आती ही नहीं तो भला लौटेगी कैसे ...

पड़ोस से आती सिसकियों की आवाज़ 
एम्बुलेंस के पहियों की चीख
मंगल ग्रह से आये जीवों से 
स्वास्थ्यकर्मियों के बूट की आवाज़ 
दहशत फैलती है ...

घबराहट है कि थमती नहीं,
ज़िन्दगी है कि चलती नहीं,
सांस है कि थमती नहीं ...
तिल-तिल कर रोज मरने से 
एक बार का “ अलविदा ” कहना बेहतर है।

15 comments:

  1. दीदी आज कविता में उदासी ?

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    1. बहुत भयानक वक्त है ....
      ईश्वर सबको सुरक्षित रखें।
      आभारी हूँ आपने मेरे अनुभवहीन लेखन को समझा।
      🙏🏻

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  2. अकेले होते जा रहे समाज में सबको साथ रहने की जरूरत है। काॅल करके, वीडियो काॅल के जरिए सभी लोग जुड़े रह सकते हैं

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    1. एकदम सही कहा आपने।
      आजकल की स्थिति सबको भयभीत करके अकेला कर दे रही है।

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  3. ना..अलविदा किसी सूरत में कुबूल नही..!
    तुम तो सबको प्रेरणा देती हो नीता..😊👍

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    1. सरस जी , दिल से शुक्रिया

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  4. मन के इस द्वन्द में इस काल में सकारात्मक और नकारात्मक सोच आती है पर जीवन हारने के लिए नहीं ... अलविदा क्यों .. ये तो परीक्षा की घड़ी है ...

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    1. साधारण इंसान अनेक संकटों से घिर गया है।
      हताशा का आना स्वाभाविक है।
      आभार आपका

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  5. सकारात्मक अच्छा लगा प्रांजल भाषा प्रभा पढ़कर

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  6. पड़ोस से आती सिसकियों की आवाज़
    एम्बुलेंस के पहियों की चीख
    मंगल ग्रह से आये जीवों से
    बढ़िया सृजन

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  7. सच में अब अवसाद बढ़ने लगा है। दुनिया को अलविदा कह दें, मन तो ज़रूर होता है। लेकिन जो समय और वक़्त आया है उससे हारना भी नहीं है। अभी के मनोविज्ञान पर बहुत अच्छी रचना।

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