चौपाल नीता की ...

Tuesday, 4 August 2020

मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी



बचपन से दादी को रामचरितमानस का पाठ करते हमेशा पाया। वह खाली बैठी कोई न कोई प्रसंग चौपाई दोहे सहित गा कर सुनाती और साथ ही अर्थ भी बतातीं। अकेली होती तो सिर्फ चौपाइयाँ गा रही होतीं। कहते हैं रस्सी की लगातार रगड़ से पत्थर पर निशान पड़ जाता है। वही हुआ भी। बिना किसी धर्म/जाति के भेद को जाने मुझे भी रामचरितमानस से लगाव हो गया। यह धार्मिक होने के लिए दी जाने वाली प्रक्रिया निश्चित रूप से नहीं थी। यह मेरे लिए एक सामान्य जीवनशैली रही जिसमें राम और सीता परिवार के सदस्य की जगह स्थापित रहे। रामचन्द्र और सीता जीवन के प्रवाह की हर लहर में मेरे माता-पिता के साथ सबसे ऊपर रहे।

धर्म की हमारे समाज में प्रचलित अवधारणा से भय लगता था। धर्म का असली अर्थ समझे बिना ही लोग धार्मिक बन गए और मारो, काटो,लूटो को गर्व से इस्तमाल करते रहे हैं। 

आस्तिक और नास्तिक दो ही पंथ हैं। जो आस्तिक है वह ईश्वर नाम की सत्ता में भरोसा करता है किंतु नास्तिक ईश्वर के होने की अनवरत घोषणा करता है। घोषणा उसी के बारे में की जा सकती है जिसका कोई अस्तित्व हो। मेरे हिसाब से नास्तिक सबसे बड़ा आस्तिक है।

ख़ैर .... अब क्योंकि अजुध्या ( अयोध्या ) मेरा गृहनगर है सो राम मंदिरों में बन्दगी करने जाना लगातार चलता रहा। गली दर गली घूमते शीश महल , सीता रसोई आदि दिखलाने ले जाना मेहमानदारी का एक प्रमुख अंग था। तमाम रिश्तेदारान आते ही अजुध्या दर्शन के लिए ही थे। 

फैज़ाबाद जिसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया है, में सरयू नदी के किनारे गुप्तारघाट है जहाँ रामचन्द्र जी ने सीता माता के धरती में प्रवेश करने पश्चात अपना धनुष कंधे से उतार कर रख दिया था और उसके पश्चात उसे कभी हाथ में नहीं लिया। इसी गुप्तारघाट से होकर बहती सरयू नदी में रामचन्द्र जी अदृश्य हो गए थे जिसके कारण से इस घाट का नाम गुप्तारघाट पड़ा। राजा साहब अयोध्या के द्वारा बनवाया भव्य मंदिर है यहाँ।



अजुध्या में कनक भवन है जिसे महाराज दशरथ ने माता सीता को विवाहोपरांत मुँह दिखाई की रस्म में उपहार में दिया था। मंदिर में बहुत बड़ा आँगन है जो मंदिर को आध्यात्मिक पुट देता है। अक्सर लोग यहाँ बैठ कर ध्यान केंद्रित करते और अपने भीतर के तमाम आवेगों को शांत करते हैं।

हनुमानगढ़ी के विषय में प्रसिद्ध है कि हनुमान जी ने स्वयं अजुध्या की रक्षा करने के लिए सबसे ऊंचे भवन की कामना की थी। मंदिर में पहुँचने के लिए सीढ़ियों का मेला है। चढ़ते जाओ, थक जाओ पर अंत नहीं दिखाई देता।

रामजन्मभूमि और मस्जिद के बीच इतनी दूरी बढ़ी कि जो कल तक दोस्तों का दोस्त समझा जा रहा था वही आपस बोलने से डरने लगा। विवाद लंबा चला। फैसला भी आया और अंततः रामजन्मभूमि का भव्य मंदिर निर्माण की समस्त प्रक्रिया चल पड़ी।

मेरे लिए रामजन्मभूमि का नवनिर्माण धर्म, आस्था से परे की बात है। मुझे दिखाई दे रहा है कि इस तीन वर्ष के निर्माण कार्य के दौरान अनेक प्रकार के रोजगार के अवसर उपलब्ध हो जायेंगें। प्रस्तावित होटल निर्माण, रिसॉर्ट्स का बनाया जाना, रेलगाड़ियों के नए फेरे लगाने की योजना, बस की संख्या का बढ़ाया जाना, हवाई यात्रा का प्रारम्भ होना निश्चित रूप से रोजगार दिलवाएगा। वर्षों से ठहरी पड़ी ज़िन्दगी दौड़ पड़ेगी। जब मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हो जायेंगीं तो कारखानों, उद्योगों के आगमन की आहट भी शीघ्र सुनाई देगी। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जीवन की बेहतरी के अवसर अवश्य उपलब्ध होंगें। यहाँ के निवासियों की जीवनशैली में सुधार होगा।

राम मंदिर निर्माण की यह भोर हम सबके जीवन में नया उज्ज्वल सवेरा लाये ऐसी कामना के साथ आप सबको बधाई प्रेषित करती हूँ।

समाचारों के विभिन्न पेज से कुछ फोटो का संकलन किया है।
आप भी चाहिए तो देखिए।


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