कुछ वक्त पहले मैं सुबह ही शॉपिंग करने गयी थी। बाज़ार जिस समय खुले उसी समय जाने से एक तो भीड़ कम होती है और दूसरे खुद का मस्तिष्क भी बवंडर से खाली रहता सो बेस्ट चॉइस का ऑप्शन सजग रहता है तथा तीसरे सेल्समैन भी शुरुआती ग्राहक को अटेंड करते समय पिछले दिन के ग्राहक की पसन्द के प्रभाव में नहीं रहता।
ख़ैर .... मुझे आपको ख़रीदारी का तरीका / माहौल नहीं समझाना है ... मेरी मूल बात से भटकने की आदत है सो भटक गयी।
Bata में चप्पलें देख रही थी। अचानक एक सेल्समैन आया और बोला आपको मैडम बुला रही हैं। मुझे समझ नहीं आया कि कौन सी मैडम पर गयी। देखा एक उम्रदराज महिला बेंच पर बैठी हुई पर्स देख रही हैं। मुझे देखकर बहुत प्यार से मुस्कुरा कर उन्होंने हेलो कहा। उनका चेहरा देख कर मुझे लगा मानो वो मुझे बचपन से जानती हैं। उन्होंने ने मुझसे हाथ में लिया हुआ पर्स दिखा कर पूछा ," Is this of pure leather ?" मुझे थोड़ा hesitation हुआ पर मैंने कहा , " No, Ma'am " ... मैंने माफ़ी माँगती नज़रों से सेल्समैन की तरफ देखा। दो-तीन बैग उन्होंने और दिखवाये। फिर मुझसे पूछा , " क्या मुझे हज़रतगंज हलवासिया में देखना चाहिए ? मुझे एक बड़े बैग की जरूरत है जिसमें मैं अपने धूप और शेड के चश्मे रख सकूँ , दवाइयाँ रख सकूँ , एक पानी की बोतल भी साइड में लगा सकूँ, वो बैग कम से कम एक साल तो चल जाये क्योंकि उसके बाद तो हो सकता है कि ..." मैंने उन्हें आगे बोलने से रोका, " Ma'am I wish you bestest health and happiness" ... उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने पास बिठा लिया। अपने बारे में काफी कुछ बताया। वो लखनऊ के IT College के ऑफिस में कार्य करती थीं। वहीं से रिटायर हुई थीं। उनका अपना मकान उन्होंने बेच दिया और अपने बेटे को उस पैसे से विदेश पढ़ाई करने भेज दिया था। बेटा वहीं बस गया कभी लौटा ही नहीं। और भी बहुत सारी बातें वो करती रहीं। मुझसे पूछा क्या मैं ईसाई हूँ पर मेरे न बोलने से कुछ निराश हुईं पर संभल गयीं। फिर खुद ही बोलीं , " You look like Catholic. Polite and well behaved. I am very fond of talking , meeting people." न जाने कितनी बातें उन्होंने की जिनका ज़िक्र बहुत लंबा हो जाएगा। एक घंटा कबका बीत गया था। बेचारा सेल्समैन अधीर होने लगा। अचानक उनकी तन्द्रा टूटी तो तमाम आशीर्वाद देती वे चली गईं। मैं बिल का भुगतान करने गयी तो मैनेजर बताने लगा कि कहीं आसपास ही रहती हैं किसी पी जी में। अक्सर आती हैं। सामान देखती हैं। कोई मिल गया तो उससे बातें करती हैं और चली जाती हैं बिना कुछ खरीदे।
कितने अकेले हैं लोग।
हो सके तो अकेलापन पहचानिए।
कोई यूँ ही नहीं अजनबियों से बातें करता है।
कभी किसी का असामान्य व्यवहार भी बारीकी से अनुभव कीजिये।
यहाँ फेसबुक पर एक ही दिन में बीसियों पोस्ट करने वाले मिल जायेंगें ... जिनकी हर पोस्ट कुछ सारगर्भित हो , उनके आचरण को अनुभव कीजिये ... कहीं ऐसा तो नहीं वे अकेलेपन से जूझ रहे हों।
भीड़ के बीच भी इंसान अकेला होता है , यह याद रखिये।
आपका दो पल शायद उन्हें कोई ख़ुशी दे जाये।


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