सोचा था आजीवन पितृ पक्ष पर मुँह नहीं खोलूँगी। इस बार नहीं रहा गया सो कुछ कहना ही चाहती हूँ क्योंकि बिना कहे चली गयी तो क्या पता भूत बन जाऊँ। हाँ सच्ची !! भूत अतृप्त आत्मायें ही तो बनती हैं।
पितरों का आगमन और बड़ी भारी तैयारी देखते थे हम बच्चे और दो या शायद तीन वर्षों तक यही समझते कि दीवाली या दशहरे जैसा कुछ होता होगा। कभी किसी ने बताया ही नहीं। दादी जो हमेशा हर वार-त्यौहार को तमाम कहानियाँ सुना कर, पकवान बनाते समय समझा कर बताती थीं कि हर छोटी बात भी मन में बैठ जाती थी, वह भी कुछ नहीं बोलतीं थीं। अम्माँ से पूछने का अर्थ सीधे कोने में मुँह करके खड़े हो जाओ की सजा मिलना सो उनसे तो दूर ही भागते हम सब। सिर्फ एक हिदायत मिलती और बार-बार मिलती कि लड़कियाँ किसी भी चीज को तब तक हाथ नहीं लगायेंगीं जब तक कहा न जाये। होश में आने के बाद पहले यह समझ में आया कि भाई लोगों को अधिक प्रेम करते हैं सब लोग। फिर समझ में आया कि लड़कियाँ बेकार होती हैं। दो एक साल बीते तो सीधे संवाद सुनाई दिए, “ लड़कियाँ पराया धन हैं। उन्हें पितरों के तर्पण, ब्राह्मण भोज की रसोई, ब्राह्मण दक्षिणा को छूने का अधिकार नहीं है। वे अपने घर जायेंगी तब अपने पितरों की सेवा करेंगीं।”
यह बहुत बड़ा झटका था। यहीं से पराया घर और अपना घर की परिभाषा बदलने की नींव पड़ी और जिसे दादी व अम्माँ कहतीं “ विद्रोहिणी का जन्म हुआ ” के नाम से प्रसिद्ध हुई। जो हमारे परिवार के सदस्य थे और पितरों में जा मिले वो अचानक कैसे लड़कियों को पराया कर गए ... यह बहुत बड़ा प्रश्न सामने आ खड़ा हुआ जिसका उत्तर देने वाला कभी नहीं मिला।
मेरे पिताजी जब नहीं रहे तो सबसे पहला बदलाव मैंने किया जिसमें मेरे भाई की पूर्ण सहमति थी और शेष परिवार की घोर नाराजगी थी कि पूरे शोक के वक्त की भाई की रसोई मैंने और मेरी बहन ने बनाई। दसवें वाले दिन जो घाट पर भोजन की पत्तल जाती है वह हम दोनों ने बनाई। तेरहवीं का ग्रन्थ साहब का भोग बनाया। जब उनकी श्राद्ध का वक्त आया तो तर्पण और अन्य विधि विधान किये। ब्राह्मणों का विरोध हुआ। हमारे यहाँ पण्डित जी ग्यारह ब्राह्मणों के साथ जीमने आते थे। उनकी मण्डली किसी भी तरह मान ही नहीं रही थी कि बेटी के हाथ का बनाया भोजन ग्रहण किया जाये। हमारे कुल परोहित जो उत्तराखंड के निवासी थे, सबको समझाया और भोजन स्वीकार करने के लिए तैयार किया। पहले वर्ष कुछ नाराजगी वाला माहौल रहा फिर अगले वर्ष से सब राजी खुशी हुआ। तीसरे वर्ष सुनने में आया कि तीन चार और परिवारों में बेटियों को सम्मलित किया गया है। फिर यह एच्छिक हो गया।
भाई जब गया तो दाह संस्कार से लेकर सभी विधियाँ भतीजे के साथ की। विरोध नहीं घोर विरोध सहा पर सब किया।
आ गया पितृपक्ष जो मेरे लिए अपनी श्रद्धा अपने दिवंगत प्रियजनों के प्रति प्रकट करने का विशेष अवसर है। यह वही श्रद्धा है जिसे मेरी अम्माँ भी अपने पति और पुत्र के लिए समर्पित करना चाहती हैं। अम्माँ के लिए तो वे प्रतिदिन की पूजा में देवता का स्थान ले चुके हैं। मेरी बहन जो अपनी ससुराल में है वह भी अपनी इच्छानुसार अपना सम्मान प्रकट करती है।
बेटी भी आपका ही हिस्सा है।
वह भी आपसे उतना ही प्रेम करती है जितना आपका पुत्र करता है।
उसे पराया मत कीजिये।

बहुत प्रेरित करने वाला पोस्ट। यह तो सच है बेटा बेटी को क़ानून से बराबरी का दर्जा मिला है पर आज भी समाज में बराबरी नहीं है।
ReplyDelete