पिता कभी नहीं जानते कि
“ बेटियों के लिए वह क्या हैं।”
पिता होते हैं तो बेटी को मिलता है एक घरौंदा,
पिता होते हैं तो बेटी को मिलते हैं मिट्टी के वे खिलौने जिनसे वह संसार बसाना सीखती है ,
पिता होते हैं तो बेटी को मिलती है वह तख़्ती और दवात जिसमें सेठे की कलम नीली स्याही में डुबो कर बेटी अपने आँचल में भर लेती है खुला आकाश।
हर रिश्ते की नींव का पहला ईंटा पिता धरते हैं ...
उन रिश्तों से मिलता है बेटी को जगमगाते उपवन का साथ,
पिता ही देते उस उपवन का सबसे सुंदर गुलाब बेटी को ...
जो देता है आश्वासन जीवन भर मायके की देहली भाई से रहेगी आबाद।
पिता ही होते हैं विशाल हृदय के स्वामी जो
बेटी की हर गलती को बदल कर उसे ही बना देते हैं
आगे बढ़ने का मार्ग,
हर कदम साथ रहकर
अपना हाथ बेटी के सिर पर रखकर
“ मैं हूँ ” का दम हैं भरते।
माँ तो जीवन भर व्यस्त रहती है बेटी को संस्कार देने में
किन्तु पिता !!
पिता ही ससुराल के हर बोझिल कदम को हैं सहज करते,
बिदाई में जब माँ चुपके से पल्लू में बेटी की एक ही सीख है बांधती - “ जा लाड़ो, अब वही है तेरा संसार ”
वहीं पिता अडिग चट्टान बन आश्वस्त करते,
“ आ जाना बार-बार मेरे पास मेरी लाड़ो !! ”
पिता का जाना ...
बेटी का आधा घर ढहा देता है,
वह रीत जाती है कहीं भीतर तक ...
संस्कारों की भीड़ में तलाशती है जीवन भर
अपने उसी आश्वस्त करते हाथ को जो ...
सिर्फ और सिर्फ
एक पिता ही दे सकते हैं।
पिता के साथ
कहीं बेटी भी तो नहीं चली जाती है .......
Very touchy which most of us do not care about father's emotions. Very appropriate.
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