( चित्र गूगल से साभार )
लखनऊ से करीब 230 किलोमीटर दूर वाराणसी मंडल में जिला जौनपुर है। यह उत्तर प्रदेश का प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है। इसको मध्यकालीन भारत के शर्की शासनकाल से पहले तक “ देवनागरी ” नाम से जाना जाता था। शर्की शासकों ने इस पर कब्जा करके इसका नाम बदल कर जौनपुर कर दिया।
अनेक प्राचीन भव्य इमारतों की गवाही देते हैं यहाँ की मस्जिदें जिनमें हैं जामा मस्जिद, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद, शाही किला, शाही ब्रिज , शीतला माता मंदिर। यहाँ पाँच शिवाला नामक शिवजी का मंदिर है जिसमें पाँच शिवालयों का समूह बेहद आकर्षक है।
प्रमुखता से यहाँ भोजपुरी और अवधी बोली जाती है जिसे मीठी बोली के रूप में माना जाता है।
जौनपुर गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है। गोमती, सईं, बसुई, बरना, पीली और मांगर नदियों व सरिताओं के किनारे बसा होने के कारण यहाँ चिकनी बलुई मिट्टी पाई जाती है और जलवायु में सदा नमी बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप यहाँ उत्पन्न होने वाली तरकारी, खरबूज आदि सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। यहाँ एक मीठी मूली जो नेवार नामक प्रजाति की होती है, उगाई जाती थी। यह मूली 6,7 फ़ीट लंबी और 2.5-3 फ़ीट मोटी होती थी। शहरीकरण की दौड़ में अब किसान इसे उगाने से बचता है। इस नेवारी मूली की गिलौरी, लच्छा, मीठा अचार बहुत बेहतरीन बनता था। यहाँ का मक्का भी विशेष स्वाद वाला होता था जिसकी खेती भी अब सरकारी उपेक्षा के कारण कम हो गयी है। इस मक्के की आलू भरी कचौड़ी का कोई मुकाबला नहीं था। मक्के के नरम दूधिया दाने से बनी रबड़ी जैसी खीर के शौक़ीन आज भी हैं जो दूसरे मक्के की खीर खा कर कभी खुश नहीं होते।
भारत के उत्तर प्रदेश में बसा ऐतिहासिक शहर जौनपुर अपने अलग-अलग और अनोखे इतिहास के लिए जाना जाता है। जौनपुर को “ शिराज-ए-हिंद ” भी कहा जाता है। यहाँ का चमेली के तेल आज भी पूरी दुनिया में जाना जाता है।
खानपान भी स्थान विशेष की पहचान हुआ करता है। जौनपुर प्रसिद्ध है नेवारी मूली, मक्का, लौंगलता,समोसे और सबसे बढ़कर “ इमरती ” के लिए।
सन् 1855 में बेनी साव ने जौनपुर में इमारती बनाना शुरू किया था। गुलामी के कठिन वक्त में भी बेनीप्रसाद की इमरती सबसे अच्छी मानी जाती थी। उसके बाद बेनी राम देवी प्रसाद के उनके लड़के बैजनाथ प्रसाद, सीताराम व पुरषोत्तम दास ने जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती की महक व स्वाद बनाए रखा। आज 165 वर्षों के बाद चौथी पीढ़ी गुणवत्ता से बिना समझौता किये मिष्ठान भण्डार चला रही है।
इमरती को बनाने के लिए उड़द की दाल, चीनी और देशी घी का उपयोग किया जाता है। देशी चीनी और देशी घी में बनने के कारण इमरती गरम होने और ठंडी रहने पर भी मुलायम रहती है। बिना फ्रिज के इस इमरती को कम से कम दस दिन तक सही हालत में रखा जा सकता है।
लकड़ी की धीमी आँच पर देसी शक्कर/चीनी जिसे खाण्डसारी कहते हैं, की चाशनी बनाई जाती है। यह चीनी खासतौर पर बलिया से मंगवाई जाती है।
उड़द की दाल की पीठी सिल पर पीसी जाती है जिसकी एकदम धीमी आँच पर देशी घी में इमारती तली जाती है।
शुद्ध देशी घी और देशी चीनी के कारण यह मुलायम बनी रहती हैं। फ्रिज में रखकर इन्हें आराम से दस दिन तक खाया जा सकता है।
आजकल बेनीराम देबीप्रसाद के परिवार की दो अन्य दुकानों के अलावा हरलालका रोड पर बेचू साव, हीरा साव और नगर पालिका के पास झगड़ू साव भी देशी घी की अच्छी इमरती बनाते हैं।
यहाँ की लौंगलता भी बहुत प्रसिद्ध है। रस से भरी लौंगलता मुँह में जाते ही घुल जाती है। गरमा गरम चाशनी में मुस्कुराती लौंगलता सबका मन मोह लेती है।
( चित्र गूगल से साभार )तीसरी सबसे प्रसिद्ध चीज है यहाँ के समोसे। समोसे बनाना एक बहुत बड़ी कला है। अगर आप किसी प्रतियोगिता में यहाँ के समोसों को ले जायें तो निश्चित रूप से ट्रॉफी जौनपुर के समोसों को ही मिलेगी। अदभुत स्वाद है जौनपुर के समोसों का। धनिया की चटनी और अदरक वाली चाय के साथ गरमा गरम समोसे बड़ी दूर से राहगीर को अपनी महक से अपनी ओर खींचते हैं।
मौका मिले तो जौनपुर अवश्य जाइये। विश्वास कीजिये कि दुबारा आप स्वयं वहाँ पहुँच जायेंगें।


बहुत अच्छी जानकारी मिली जौनपुर के बारे में।
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