कोरोना को भारत में आये करीब डेढ़ साल होने को आये। स्वास्थ्य ही नहीं उसने तो जीवन के हर क्षेत्र को अपने कंट्रोल में ले लिया है। हर तरफ हाहाकार है, कोहराम है। किल्लत में बिना किसी की सहायता के नहीं चलता फिर ये तो किल्लत की सिरमौर समस्या है जिसमें हर तरीके की दुश्वारियाँ हैं।
किसी की सहायता करने से अक्सर इच्छा होते हुए भी इंसान पीछे हट जाता है क्योंकि उन्हें पता होता है कि उस कार्य में धन लगता है।
हर कोई धनाढ्य नहीं होता और अगर है भी तो परोपकार की भावना से युक्त नहीं होता।
और आख़िरी सबसे महत्वपूर्ण बात जिसे अंडरलाइन में देखिएगा कि लगभग सभी ने या आधे लोगों ने नोटबन्दी के समय से अपने संचित धन में लगातार कमी होती ही देखी है। पहले लॉक डाउन के समय से तो लाल रेखा ग्राफ पर तेजी से पाताल लोक से गले मिलने दौड़ी जा रही है।
मैं निजी तौर पर इस समय ऐसे कई परिवारों को जानती हूँ जिनकी आमदनी शून्य हो चुकी है और संचित धन चंद दिनों का मेहमान है।
मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या मानसिक होती है कि न तो वे स्वयं को निम्न आयवर्ग में रखकर तदनुसार आचरण कर पाते हैं कि मुफ्त मिलने वाला सरकारी राशन ही आगे बढ़कर सहायता वैन से ले पायें,
और ...
न ही इतनी हिम्मत होती है कि बैंक में खुद को गरीब घोषित कर प्रधानमंत्री सहायता और मुख्यमंत्री सहायता ही पा कर कम से कम बुखार की पैरासिटामोल ही खरीद पायें।
ये बस धनाढ्य वर्ग कार्बन कॉपी बनने और नकली शो बाजी वाली ज़िन्दगी जीने के फेर में अपनी ज़िंदगी दुश्वारियों से भर देते हैं।
साथ पुरवाने को होते हैं कुछ एक्सकलमेटरी शब्द और नीचा दिखाती नज़रें। अगर सिंहासन से उतरना भी चाहें तो दूसरे उनके पैर के नीचे की जमीन खींच लेने को तैयार बैठे होते हैं।
अब ऐसे में किसी दूसरे की सहायता भला कौन करेगा जबकि वह अपनी ही सहायता नहीं कर पा रहा।
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